भारतीय अर्थव्यवस्था पर संकट की शुरुआत 8 नवंबर, 2016 की रात को हुई थी। डॉक्टर मनमोहन सिंह ने दूरदर्शिता के साथ संसद में कहा था कि नोटबंदी से देश की जीडीपी में 2% की गिरावट होगी, लेकिन उनकी सलाह को प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने पूरी तरह नकार दिया। नोटबंदी की त्रासदी और GST की मानव निर्मित आपदाओं ने मिलकर लाखों लोगों की रोजी-रोटी छीन ली और अर्थव्यवस्था को लंबे अरसे के लिए गर्त में धकेल दिया। साथ ही कच्चे तेल के दाम में आई ऐतिहासिक गिरावट के बावजूद सरकार ने पेट्रोल-डीज़ल पर भारी टैक्स लगाकर परिवार के सिकुड़ते बजट पर और बोझ डाल दिया।
अब सरकार दशकों की मेहनत से खड़ी की गई सरकारी कंपनियों और जनता की संपत्ति को जल्दबाजी में बेचकर खजाना भरना चाहती है। सावधानीपूर्वक लागू की गई विनिवेश नीति (यानी PSU में सरकार की हिस्सेदारी का विनिवेश) से भी सरकार के लिए संसाधन उत्पन्न हो सकते हैं, लेकिन उसने ‘विनिवेश’ के बजाय ‘प्राइवेटाइजेशन’ की नीति अपनाई है। औने-पौने दामों में सरकारी संपत्ति की बिक्री को यह कहकर सही ठहराया जा रहा है कि इससे प्रबंधन बेहतर होगा और सरकारी स्कीमों के लिए पैसा भी उपलब्ध होगा। यह कुतर्क है। वास्तव में PSU का मुनाफा तो प्राइवेट हाथों में चला जाएगा और प्राइवेट सेक्टर का नुकसान देश के हिस्से में आएगा।
यहां कुछ गंभीर दीर्घकालिक परिणाम भी हैं, जिन्हें नजरअंदाज किया जा रहा है। LIC और इसके प्रस्तावित IPO के जरिए सरकार की हिस्सेदारी बेचना भारत में बीमा क्षेत्र की इस शीर्ष कंपनी को निजी हाथों में सौंपने की तरफ कदम बढ़ाने का संकेत है। प्राइवेट हाथों में जाने के बाद क्या LIC देश की ढांचागत परियोजनाओं को लंबे समय तक धन उपलब्ध करवाने की हमारी महत्वपूर्ण जरूरत को पूरा करेगी? PSU ने पिछड़े क्षेत्रों के विकास में सक्रिय भूमिका निभाई है। इन्हें प्राइवेटाइज करने पर ऐतिहासिक रूप से समाज के हाशिए पर खड़े वर्गों के लिए आरक्षण और मौके खत्म हो जाएंगे।
इस सरकार के कार्यकाल में भारी संख्या में रोजगार खत्म हुए और रिकॉर्ड स्तर पर बेरोजगारी फैली। उसके बाद भी सरकार प्राइवेटाइजेशन के बाद अनिवार्य रूप से होने वाली छंटनी से प्रभावित कर्मचारियों की रोजी-रोटी की फिक्र के बारे में पूरी तरह उदासीन रवैया अपनाए हुए है। बैंकिंग क्षेत्र में भी इस सरकार के कार्यकाल में NPA में बेतहाशा वृद्धि हुई है। 2014-15 और 2019-20 के बीच इस सरकार के कार्यकाल में सकल NPA, 2008-2014 के मुकाबले 365 गुना बढ़ गया।
इस सरकार के कार्यकाल में देश का पैसा लेकर भागने वाले भगोड़ों की संख्या भी तेजी से बढ़ी है। NPA से निपटने में फेल, यह सरकार पब्लिक सेक्टर के बैंकों (PSB) का निजीकरण करना चाहती है। भारत में यस बैंक और प्राइवेट सेक्टर की दूसरी दिवालिया संस्थाओं का तजुर्बा देखकर यह कहना मुश्किल है कि केवल प्राइवेटाइजेशन से ही बैंकिंग व्यवस्था में घालमेल और भ्रष्टाचार समाप्त हो सकेगा। यह न भूलें कि राष्ट्रीयकृत बैंकों की वित्तीय मजबूती ने ही साल 2008-09 की वैश्विक मंदी के बुरे असर से हमें बचाए रखा था।
पिछले 5 दशकों में सरकारी क्षेत्र के बैंकों ने ही भारत में बैंकिंग सेवाओं से वंचित लोगों को वित्तीय समावेशन के दायरे में लाने में मुख्य भूमिका निभाई है। क्या गांव की बैंक शाखाएं, जो मुनाफा कमाने से ज्यादा जनहित के लिए काम करती हैं, उन्हें अपने भावी कॉर्पाेरेट मालिकों द्वारा बंद नहीं कर दिया जाएगा? यह भी स्पष्ट है कि RBI द्वारा बैंकों की मिल्कियत औद्योगिक घरानों के पास न होने देने की दीर्घकालिक नीति को पूरी तरह बदला जा रहा है। ऐसे निर्णय से अर्थव्यवस्था और देश का पैसा केवल कुछ हाथों में केंद्रित हो जाएगा।
एक ऐसी पार्टी के तौर पर, जिसने पब्लिक सेक्टर की मजबूत नींव पर भारत की अर्थव्यवस्था का निर्माण किया और उसके बाद उदारीकरण समेत 1991 के ऐतिहासिक सुधारों की शुरूआत भी की, कांग्रेस पार्टी का यह कर्तव्य है कि वो सरकारी संपत्ति के सही मूल्यांकन, जवाबदेही और पारदर्शिता की मांग को जनहित में जोर से उठाए।
हमारे कई PSU और सरकारी बैंक आज भी मुनाफे में हैं। सरकारी खजाने को PSU की बिक्री से ज्यादा लाभ मिले, इसके लिए केंद्र सरकार को हर उपक्रम की स्थिति अनुरूप उचित नीति अपनानी होगी। प्राइवेटाइजेशन पर यह कहकर बल दिया जा रहा है कि व्यवसाय करना सरकार का काम नहीं है। उन्हें यह याद दिलाए जाने की जरूरत है कि जो सरकार देश में वित्तीय प्रबंधन करने में फेल साबित हुई है, जो सरकार रोजगार देने में विफल है, जो सरकार समावेशी विकास सुनिश्चित नहीं कर सकती, जिस सरकार को चलाने के लिए देश की संपत्तियां बेचकर पैसा अर्जित करना पड़े, ऐसी सरकार को सत्ता में भी बने रहने का कोई अधिकार नहीं है।
सोनिया गांधी
(लेखिका कांग्रेस अध्यक्षा हैं ये उनके निजी विचार हैं)