ऐक्टर आमिर खान और किरण राव ने 15 साल तक चली अपनी शादी के बाद अलग होने का फैसला कर लिया है। उन्होंने बाकायदा साझा बयान जारी करके इस बात का ऐलान किया। उन्होंने लिखा कि 15 साल के इस साथ में हमने पूरी जि़ंदगी के अनुभव लिए, खुश रहे, हंसे और हमारा रिश्ता केवल भरोसे, सम्मान और प्यार के सहारे आगे बढ़ा। अब हम अपनी जि़ंदगियों का एक नया अध्याय शुरू करने जा रहे हैं। अब हम पति-पत्नी के तौर पर नहीं, बल्कि को-पैरंट्स के तौर पर और एक- दूसरे के परिवार के तौर पर रहेंगे। हमने कुछ वक्त पहले तय किया था कि अलग हो जाएंगे और अब हम अलग हो चुके हैं।’ इनके फैसले के बाद लोगों के मन में तमाम सवाल उमड़ रहे हैं। कुछ लोग आमिर को गलत ठहरा रहे हैं तो कुछ किरण को। आखिर दो लोग अगर अपनी मर्जी से शादी से बाहर आने का फैसला करते हैं तो इतने सवाल क्यों उठते हैं। पेश है एक नज़रियालो भाई, आमिर खान और किरण राव ने भी अपने-अपने रस्ते पकड़ लिए।
अवाम सर पीट रही है, सुनकर उनके होश उड़ गए हैं। उनका बस नहीं चल रहा कि किसी छोटे मोटे जिन्न का सहारा लेकर उड़ते हुए जाएं और आमिर भाई को खरी-खरी सुनाकर आ जाएं। बताओ जऱा, आमिर को अपने रिश्तेदारों का खौफ़ नहीं? चलो खुदा का खौफ न भी करो मगर रिश्तेदारों से तो डरो? हैं!! उनकी फूफियां और खालाएं, यह क्यूं नहीं कहतीं कि बेटा किसी तरह निबाह कर लो, हमारा इज्जतदार घराना है। यहां जान चली जाए मगर इज्जत पे दाग न लगे।’ आमिर की दूर की मुमानी ने नहीं कहा कि बेटा, बच्चों का सोच लो। तुम्हारा क्या है आधी जिंदगी कट गई, बाकी आधी भी कट जाएगी। मत भूलो हर इंसान गम में डूबा है। तुम्हारे जैसे बहुत लोग परेशान हैं लेकिन लोग चुपचाप रिश्ते का भ्रम बनाये हुए हैं न? और अल्लाह का एहसान हुआ कि किरण राव हमारे ख़ानदान में पैदा नहीं हुईं, वरना रिश्ते की छोटी चची कहतीं, ‘बेटी सब्र करो, अपना नहीं तो ख़ानदान का सोचो। तुम्हारी बाक़ी ममेरी-खलेरी बहनों का ब्याह होना है।
लोग क्या कहेंगे? कौन करेगा तुम्हारी बहनों से शादी?’ मुमानी की अम्मी सिर पर हाथ फेरते हुए जज़्बाती लहजे में कहतीं, ‘क्या करोगी हम औरतों के हिस्से में सर झुकाना लिख दिया गया है। तुम किस किससे लड़ोगी बेटी? अपने मां- बाप के चेहरे की तरफ देखो। सिर्फ अपने लिए जीना भी कोई जीना है? अरे इज़्ज़त कमाते बरसों लग जाते हैं, मगर रुसवाई होने में सेकेंड भी न लगते बेटी।’ और इस तरह से दोनों तरफ के रिश्तेदार मिलकर मजबूर कर देते कि तुम साथ रहो। भले ही एक-दूसरे को ज़हर लगो। क्या हुआ जो सारी जिंदगी चिढ़ते-किलसते हुए गुजऱी। इससे क्या फर्क पड़ता है कि दो लोग अलग रहकर एक बेहतर दुनिया बना सकते हैं अपने लिए। और हां, जो लोग परेशान हो रहे हैं उनसे गुज़ारिश है बिना वजह रिश्तेदार मत बनो। यह ज़रूरी नहीं कि हर कोई तुम्हारी तरह सिर्फ जि़ंदगी काट देना चाहें। कुछ लोग अपने तरीके से जीना चाहते हैं, जो बेखौफ होते हैं, जिन्हें फ़ालतू की टीका-टिप्पणियों से कोई फर्क नहीं पड़ता।
सबाहत आफरीन
(लेखिका की फेसबुक वॉल से, ये उनके निजी विचार हैं)




















