गुजरात के बाद उत्तर प्रदेश भाजपा और संघ की प्रयोगशाला है। राजनीति के भक्ति काल की शुरुआत उत्तर प्रदेश से ही मानी जा सकती है। नब्बे के दशक में मंडल के बरक्स शुरू हुई कमंडल राजनीति की जड़ें इसी प्रदेश में हैं। मौजूदा समय में इस राजनीति का प्रतिनिधि चेहरा योगी आदित्यनाथ हैं। मध्य प्रदेश में प्रज्ञा सिंह ठाकुर, बिहार में गिरिराज सिंह, ओड़िशा में चंद्र प्रताप सारंगी आदि भी इसी राजनीति के प्रतिनिधि चेहरे हैं, जो भाजपा की ग्रैंड राजनीतिक डिजाइन को अलग अलग समय में पूरा करेंगे। इन पर बाद में अलग से बात करेंगे।
फिलहाल असली सवाल है कि भाजपा उत्तर प्रदेश की बिसात पर बिछी बाजी कैसे जीत रही है और आगे कैसे जीतेगी? ऐसा लगता है कि बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती जाने अनजाने में भाजपा का एजेंडा पूरा करने में सहयोगी बनेंगी। अन्यथा अभी समाजवादी पार्टी के साथ तालमेल तोड़ने का क्या तर्क बनता है? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी चुनावी सभाओं में कहा था कि 23 मई को नतीजे आएंगे तो ये सारे ‘महामिलावटी’ एक दूसरे से लड़ कर अलग हो जाएंगे। ऐसा लग रहा है कि मोदी के उस कहे को पूरा करने के लिए मायावती ने आनन फानन में सपा से तालमेल खत्म किया।
कहने का मतलब यह नहीं है कि मोदी ने मायावती से कहा और उन्होंने तालमेल तोड़ लिया। समझने की बात सिर्फ ये है कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह किस तरह से चाहे मायावती हों या नीतीश हों या ममता बनर्जी हों उनके एक एक दांव को समझते हैं! उनकी सबसे बड़ी ताकत यहीं है कि वे जानते हैं कि उनका कौन सा विरोधी कब, कैसे बरताव करेगा। वे पहले से उसकी तैयारी रखते हैं। उन्होंने पहले बताया था कि 23 मई के बाद महागठबंधन टूट जाएगा और सचमुच 23 मई के दस दिन बाद गठबंधन टूट गया। वह भी तब, जबकि मायावती को सपा के साथ तालमेल का बहुत बड़ा फायदा हुआ है। सीटों की संख्या के लिहाज से बसपा शून्य से दस पर पहुंच गई।
यह सपा और रालोद से तालमेल का फायदा था कि बसपा का वोट कई सीटों पर दोगुने से ज्यादा हो गया। 2014 के मुकाबले बिजनौर में बसपा का वोट 22 से बढ़ कर 51 फीसदी हो गया। नगीना में 26 से बढ़ कर 56, अमरोहा में 15 से बढ़ कर 51, अंबेडकर नगर में 28 से बढ़ कर 52 फीसदी पहुंच गया। वह जिन 38 सीटों पर लड़ी थी, उसमें एक फतेहपुर सिकरी को छोड़ कर बाकी सारी सीटों पर उसका वोट दोगुना या उससे ज्यादा हो गया। फतेहपुर सिकरी सीट पर कांग्रेस के राज बब्बर की वजह से बसपा की सीटें कम हुईं। चुनाव के बाद कराए गए सर्वेक्षणों के आधार पर इंडिया टुडे समूह का दावा है कि सिर्फ 20 फीसदी यादव वोट भाजपा को मिला और 72 फीसदी के करीब वोट सपा, बसपा और रालोद को मिले। इसके सर्वेक्षण के मुताबिक जाटव वोट में से 21 फीसदी वोट भाजपा को गया और 70 फीसदी से कुछ ज्यादा जाटव वोट महागठबंधन को मिला। गैर-जाटव दलित का करीब 70 फीसदी वोट भाजपा को गया।
जाहिर है कि जितना जाटव वोट महागठबंधन को मिला उतना ही यादव वोट भी महागठबंधन को मिला। फिर भी मायावती ने यह कहते हुए गठबंधन खत्म किया है कि अखिलेश यादव अपने वोट ट्रांसफर नहीं करा पाए। ऐसा लगता है कि उन्होंने सपा से अलग होने का एक बहाना खोज लिया, जिसका कोई आधार नहीं है। बहरहाल, यह तो एक पहलू है, जिससे लगता है कि कैसे मायावती जाने अनजाने में भाजपा की बिसात का एक मोहरा बन गईं। इसके अलावा भी उसने कई मोहरे अपनी अपनी जगह बैठाए हैं।
नरेंद्र मोदी के खुद उत्तर प्रदेश में चुनाव लड़ने और मुख्य विरोधी के तौर पर मुलायम सिंह यादव की बनाई पार्टी सपा की मौजूदगी इस बात की गारंटी है कि गैर-यादव पिछड़ी जातियों के वोट भाजपा को जाएंगे। मोदी ने अपनी अति पिछड़ी जाति की पहचान बहुत होशियारी से उत्तर प्रदेश में स्थापित की है। पिछले चुनाव में मायावती ने इसमें उनकी मदद की। उन्होंने बिना मतलब के प्रचार के दौरान कहना शुरू किया कि मोदी नकली ओबीसी हैं। इससे मोदी को अपनी जाति बताने का मौका मिला। ध्यान रहे उत्तर प्रदेश में एक चौथाई सवर्ण आबादी है, जो मोटे तौर पर भाजपा की समर्थक है। इसके साथ मोदी ने अति पिछड़ा वोट जोड़ दिया है। मायावती और अखिलेश की राजनीति को समझते हुए मोदी और शाह ने गैर-यादव, गैर-जाटव और सवर्ण जातियों का एक करीब 50 फीसदी वोट का समीकरण बनाया है।
अपने इस 50 फीसदी के वोट बैंक को एकजुट रखने के लिए भाजपा हिंदुत्व के रसायन का इस्तेमाल करती है। 2017 के विधानसभा चुनाव में श्मशान और कब्रिस्तान का मुद्दा बना तो इस बार के लोकसभा चुनाव में अली और बजरंग बली का मुद्दा बना। इसके लिए ही भाजपा ने योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बना कर बैठाया है। अगर कोई दूसरा मुख्यमंत्री होता तो उसकी पहचान जाति से होती, जैसे कल्याण सिंह के समय उनकी पहचान लोध जाति से हो गई थी। हालांकि ऐसा नहीं है कि योगी जातिवाद नहीं करते हैं। वे ठाकुरवाद करते हैं पर इससे ब्राह्मण और भूमिहार छोड़ कर दूसरा वर्ग ज्यादा प्रभावित नहीं होता है। प्रभावित होने वाली जातियों का भी बड़ा हिस्सा हिंदुत्व की गोंद के कारण भाजपा से चिपका रहता है।
सो, भाजपा का वोट उसके साथ मोटे तौर पर चिपके रहना है। पर महागठबंधन के कारण सपा और बसपा के जो वोट एक दूसरे को ट्रांसफर हुए थे अब उनमें आपस में अविश्वास पैदा होगा। जो बात भाजपा प्रचार में कहती थी, मायावती ने उसे प्रेस बयान जारी कर कह दिया। इससे दोनों के कोर वोट में अविश्वास बढ़ेगा और तभी यह माना जा रहा है कि जब वे अगली बार साथ आएंगे तो कोई असर छोड़ने की स्थिति में नहीं होंगे। इसलिए अब भाजपा को उत्तर प्रदेश में रोकने के लिए विपक्षी पार्टियों को कुछ नए रसायन तैयार करने होंगे। हिंदुत्व की गोंद जब तक नहीं छूटेगी तब तक जातियों का अंकगणित किसी काम नहीं आना है।
अजित द्विवेदी
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, ये उनके निजी विचार हैं




















