गोरखनाथ की धरती से रविवार को किसान सम्मान निधि योजना की शुरुआत हो चुकी है। इसके तहत पहली किस्त दो हजार रुपये सीमांत कृषकों के खाते में डाली गयी है। इससे एक करोड़ से अधिक किसानों को फायदा पहुंचा है। इस योजना से देश के कुल 12 करोड़ किसान लाभान्वित होंगे। चुनावी वर्ष में इस तकह की सौगात का सीधा मतलबल होता है कि लाभ पाने वाले से अपने लिए उम्मीग रखना। देश के भीतर किसानों की दुर्दशा किसी से छिपी नहीं है। हर बरस हजारों की तादाद में अन्नदाता कर्ज ना दे पाने की स्थिति में अवसादग्रस्त होकर खुदकुशी की तरफ बढ़ते हैं। इसमें कृषि उत्पादों की बाजार सम्मत कीमतें तय ना होना बड़ा कारण है। जाहिर है कि जब लागत भी वापस ना लौटे तो कर्ज का बोझ गंभीर हो जाता है। अरसे से देश के किसान अपनी आमदनी बढ़ाने के लिए आंदोलन करते रहे हैं। सरकार में कोई भी पार्टी रही हो उन्हें कर्जमाफी के रूप में फौरी राहत तो मिली लेकिन उनकी समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सका। इसी कारण काफी समय से किसानों को लेकर राजनीतिक स्तर पर चर्चाएं तो होती रहीं लेकिन शासन की नीतियों में उनकी चिंता के लिए कोई सरोकार शामिल होता नहीं दिखा। इसी से एक तरह से इस बड़े तबके में सरकारों के प्रति मोहभंग की स्थिति पैदा हो गई थी।

2014 में भाजपा ने स्वामीनाथन कमीशन के सुझावों को तरजीह देने की बात रखी तो किसानों में एक बार फिर उम्मीद जगी। पर बाद में मोदी सरकार की तरफ से दोगुनी आमदनी को लेकर सुप्रीम कोर्ट में विवशता का इजहार किया गया। तब किसानों को गहरी निराशा हुई और उसी का इस बरसों में समय-समय पर मुंबई से लेकर दिल्ली तक प्रदर्शन हुआ। जिसमें कई राजनीतिक दल भी शामिल हुए। दो महीने पहले पूरा विपक्ष आंदोलित किसानों के पीछे खड़ा था। हालांकि बाद में मोदी सरकार ने कमीशन को आधा-अधूरा लागू किया। दो दर्जन से ज्यादा कृषि उत्पादों पर समर्थन मूल्य तक किए गए। खरीद लक्ष्य बढ़ाने के बाद भी किसानों की समस्या का समाधान नहीं किया जा सका। यह सच है कि समर्थन मूल्य बढ़े और ज्यादा खरीद का भरोसा दिलाया गया। पर सरकारी तंत्र की घोर लापरवाही से यह मरहमी कोशिश भी बेकार साबित हुई। कृषि विशेषज्ञों और अर्थशास्त्रियों की तरफ से बार-बार कहा जा रहा था कि कृषि क्षेत्र संकट के दौर से गुजर रहा है। सिर्फ कर्जमाफी से किसान तबके की परेशानी दूर नहीं की जा सकती। बहुत जरूरी है कि इस बाबत एक निश्चित रकम किसानों के खाते में पहुंचायी जाये। इस सुझाव पर मोदी सरकार 2016 से विचार कर रही थी। सरकार के आर्थिक सलाहकार अरविन्द सुब्रह्रमण्यम के मुताबिक 18 हजार रुपये वार्षिक की मदद से किसानों को थोड़ी बहुत राहत मिल सकती है। पर इस मदद के प्रारुप पर विचार-मंथन चल रहा था। इन सबके बीच सीयासी गलियारों में भी खूब चर्चा थी कि बेसिक इनकम के तौर पर किसानों के लिए कोई राशि तय हो सकती है। शायद आखिरी बजट में मोदी सरकार ऐसी कोई घोषणा कर दे। इस अनुमान को ध्यान में रखते हुए कांग्रेस की तरफ से किसानों को 18 हजार रुपये सालाना देने का वादा कर दिया गया।।




















