आतंकवादः बात और लात, दोनों चलें

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कश्मीर में हमारे लगभग 50 जवानों की हत्या ने देश को ऐसा दहला दिया है कि अनेक परस्पर विरोधी नेता भी आज एक स्वर में बोल रहे हैं। यह वक्त इतना नाजुक है कि भारत सरकार जो भी कदम उठाएगी, सारा देश उसका साथ देगा। सरकार ने फौज को पूरी तरह से अपने कदम बढ़ाने की आजादी दे दी है लेकिन असली सवाल यह है कि सरकार जो कदम उठा रही है, क्या उनका कोई असर पाकिस्तान पर होगा ? पाकिस्तान की सरकार और वहां के मीडिया ने तो पुलवामा में हत्याकांड से पूरी तरह से हाथ धो लिए हैं। उनका कहना है कि यह कश्मीरियों का अपना मामला है, इससे उनका कुछ लेना-देना नहीं है।

पाकिस्तानी सरकार के प्रवक्ता ने दुनिया के अन्य राष्ट्रों की तरह इस हत्याकांड की औपचारिक निंदा भी कर दी है। भारत ने पाकिस्तान का ‘सर्वाधिक अनुग्रहीत राष्ट्र’ का दर्जा खत्म कर दिया है। इस व्यापारिक दबाव का उस पर क्या असर पड़ना है ? यदि हम उन्हें नदियों का पानी देना बंद कर दें तो कुछ दबाव जरुर बनेगा लेकिन इन छोटे-मोटे दबावों से भी क्या वह अपनी राह बदलेगा ? यह तो मुश्किल ही है। इस वक्त उसकी मदद करने वाले देशों की लाइन लगी हुई है।

संयुक्त अरब अमारात ने उसे अरबों रु. देने की घोषणा की है। सउदी अरब भी अरबों-खरबों उसे देने को तैयार है। चीन का तो पूछना ही क्या है ? वह तो पाकिस्तान के लिए पैसा पानी की तरह बहा रहा है। और जहां तक अमेरिका का सवाल है, वह पाकिस्तान और अफगानिस्तान के आतंकवाद का असली जन्मदाता है। अभी उसे तालिबान से बात करने की गर्ज है और अफगानिस्तान से वह अपना पिंड छुड़ाना चाहता है। इसलिए वह पाकिस्तान को नाराज नहीं कर सकता। वह भारत-विरोधी आतंकवाद के खिलाफ सिर्फ जबानी जमा-खर्च करता रहता है।

कुल मिलाकर मेरी समझ यह है कि इन कूटनीतिक दबावों से पाकिस्तान पर ज्यादा फर्क नहीं पड़ने वाला है। ज्यादा जरुरी है कि पाकिस्तान से भारत सीधी बात करे और दो-टूक बात करे। उसे समझाए कि आतंकवाद के जरिए वह हजार साल भी कोशिश करेगा तो भी वह अपने इरादों में कामयाब नहीं हो सकता। यह आतंकवाद भारत से भी ज्यादा पाकिस्तान का नुकसान करेगा। यदि पाकिस्तान ठीक रास्ते पर नहीं आए तो भारत उसे बता दे कि जो भी आतंकवाद की घटना घटेगी, भारत उसके मूल तक जाएगा और वह सीधे उसकी जड़ पर प्रहार करेगा।

अंतरराष्ट्रीय कानून में इसे ‘हॉट परस्यूट’ (ठेट तक पीछा) कहते हैं। ऐसा करते समय यदि भारत को कठोर फौजी कदम उठाने पड़ें तो वे भी उठाए जाएं। बात और लात दोनों चलें। आतंकवाद का स़्त्रोत अंदरुनी हो या बाहरी, उसे उखाड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी जानी चाहिए।

डॉ. वेदप्रताप वैदिक
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है)

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