श्रीदुर्गा महाअष्टमी : रविवार, 6 अक्टूबर
श्रीदुर्गा महानवमी : सोमवार, 7 अक्टूबर
नवरात्र व्रत का पारण : मंगलवार, 8 अक्टूबर
कुमारी पूजन से होती है नवरात्र व्रत की परिपूर्णता
नवरात्र में जगतजननी मां जगदम्बा दुर्गाजी की पूजा-अर्चना की विशेष महिमा है। ज्योतिर्विद् श्री विमल जैन ने बताया कि नवरात्र के धार्मिक अनुष्ठान में पूजा-अर्चना के पश्चात कुमारी कन्या की पूजा करना अत्यन्त आवश्यक है। कुमारी कन्याओं को त्रिशक्ति यानि महाकाल, महालक्ष्मी एवं महासरस्वती देवी का रूप माना गया है। नवरात्र में व्रतकर्ता को या देवीभक्त को व्रत के पारण के पूर्व कुमारी कन्या एवं बटुक की विधि-विधानपूर्वक पूजन करके उनका आशीर्वाद लेना चाहिए। श्रीदुर्गाजी की अर्चना करके हवन आदि करने का विधान है। इस बार रविवार, 6 अक्टूबर को महाअष्टमी व सोमवार, 7 अक्टूबर को महानवीमी का व्रत रखा जाएगा। महानिशा पूजा शनिवार, 5 अक्टूबर को मध्यरात्रि में होगी।
ज्योतिषविद् श्री विमल जैन ने बताया कि इस बार आश्विन शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि शनिवार, 05 अक्टूबर को दिन में 9 बजकर 51 मिनट पर लगेगी जो कि अगले दिन रविवार, 06 अक्टूबर को दिन में 10 बजकर 55 मिनट तक रहेगी। तत्पश्चात नवमी तिथि लग जाएगी जो कि सोमवार, 7 अक्टूबर को दिन में 12 बजकर 38 मिनट तक रहेगी। तदुपरान्त दशमी तिथि प्रारम्भ हो जाएगी, जो कि मंगलवार, 8 अक्टूबर को दोपहर 2 बजकर 50 मिनट तक रहेगी। इसी दिन श्रवण नक्षत्र रात्रि 8 बजकर 12 मिनट तक रहेगी। अष्टमी तिथि उदया तिथि के रूप में रविवार, 6 अक्टूबर को है, फलस्वरूप महाअष्टमी का व्रत इसी दिन रखा जाएगा। महानवमी का व्रत सोमवरा, 7 अक्टूबर को रखा जाएगा। महानवमी का व्रत रखकर जगदम्बाजी की विधि-विधानपूर्वक पूजा-अर्चना की जाएगी। महाअष्टमी तिथि व महानवमी तिथि के दिन कुमारी पूजन व बटुत पूजन का विधान है। नवरात्र व्रत का पारण मंगलवार, 8 अक्टूबर को किया जाएगा। इसी दिन दशमी तिथि दोपहर 2 बजकर 50 मिनट तक रहेगी। जिसके फलस्वरूप विजया दशमी का पर्व इसी दिन मनाया जाएगा। इसी दिन अपराजिता देवी तथा शमी वृक्ष की पूजा होती है साथ ही शास्त्रों के पूजन का भी विधान है। विजया दशमी के दिन नीलकण्ठ पक्षी का दर्शन किया जाता है, उन्हें आजाद करवाया जाता है।

श्री विमल जैन ने बताया कि देवीभागवत ग्रन्थ के अनुसार अपनी मनोकामना की पूर्ति के लिए अलग-अगल वर्ण या सभी वर्णों की कन्याओं का पूजन करना चाहिए। धर्मशास्त्रों में उल्लेखित है कि ब्रह्मण वर्ण की कन्या- शिक्षा ज्ञानार्जन व प्रतियोगिता, क्षत्रिय वर्ण की कन्या-सुयश व राजकीय पक्ष से लाभ, वैश्य वर्म की कन्या – आर्थिक समृद्धि व धनवृद्धि के लिए एवं शूद्र वर्ण की कन्या – कार्यसिद्धि एवं शत्रुओं पर विजय के लिए लिधि-विधानपूर्वक पूजा-अर्चना करनी चाहिए। दो वर्ष से दस वर्ष तक की कन्या को देवी स्वरूप माना गया है जिनकी नवरात्र पर भक्तिभाव के साथ पूजा करने से भगवती जगदम्बा का आशीर्वाद मिलात है। शास्त्रों में दो वर्ष की कन्या को कुमारी, तीन वर्ष की कन्या-त्रिमूर्ति, चार वर्ष की कन्या – कल्याणी, पाचं वर्ष की कन्या – दुर्गा तथा दस वर्ष की कन्या को सभद्रा के नाम से दर्शाया गया है। कुमारी कन्या की आयु (उम्र) विशेष पूजा के अनुसार भी अलग-अलग फल मिलते हैं। दो वर्ष की कन्या- दुःख दारिद्र्य से मुक्ति, तीन वर्ष की कन्या-विजय और राजयोग, सात वर्ष की कन्या – ऐश्वर्य व वैभव में वृद्धि, आठ वर्ष की कन्या – वाद-विवाद में सफलता तथा नौ वर्ष की कन्या – शत्रुओं का पराभव एवं कठिन कार्य में पूर्णता तथा दस वर्ष की कन्या- समस्त मनोकामना की पूर्ति। इनकी पूजा-अर्चना करने से मनोवांछित फल मिलता है। पूजन हेतु कन्याएं अस्वस्थ, विकलांग एवं नेत्रहीन नहीं होनी चाहिए। फिर भी इनकी अपेक्षा न करते हुए इन कन्याओं की यथाशक्ति यथासामर्थ्य सेवा व सहायता करते रहने पर जगत जननी मां दुर्गा की कृपा सदैव बनी रहती है। कन्याओं का पूजान करने के पश्चात उनको पौष्टिक व रुचिकर भोजन करवाकर उन्हें नव वस्त्र, ऋतुफल, मिष्ठान तथा नगद द्रव्य आदि उपहार स्वरूप देकर उनके चरणस्पर्श करने के पश्चात उनसे आशीर्वाद प्राप्त करके लाभ उठाना चाहिए।


















