आदत हसन मंटो की ‘किसान कन्या’ से ‘मदर इंडिया’ तक किसान और सूदखोर महाजन पर फिल्में बनती रहीं हैं। ‘मदर इंडिया’ के पहले बिमल रॉय की बलराज साहनी अभिनीत ‘दो बीघा जमीन’ किसान कर्ज और उसके मजदूर बनाए जाने की कथा प्रस्तुत करती है। यह दु:खद है कि किसान फिल्में महानगरों व बड़े शहरों में प्रदर्शित की गईं। आज भी हजारों गांवों में बिजली नहीं पहुंची है। संजीव बक्षी की एक कथा में गांव वाले बिजली लाने का वादा करने वालों को अपनी जमीन मुत में देते हैं। सरकारें बदलती रहीं परंतु बिजली नहीं आई। कुछ वर्ष पश्चात किसान आंदोलन करते हैं। अश्रु गैस और लाठियां उनका उत्साह नहीं तोड़ पातीं। व्यवस्था उन्हें जेल भेज देती है। जेल में बिजली है, रोशनी है। किसान प्रसन्न है कि कहीं तो रोशनी है। ‘मदर इंडिया’ के पहले बिमल रॉय ‘दो बीघा जमीन’ बना चुके थे। इसके कोई एक दशक बाद फि़ल्मकार जेटली ने मुंशी प्रेमचंद की कथा ‘दो बैलों की कहानी’ से प्रेरित ‘हीरा मोती’ बनाई। वे ‘गो दान’ और ‘सेवा सदन’ भी बनाना चाहते थे परंतु उनकी असमय मृत्यु हो गई।
इसके लगभग आधी सदी बाद आशुतोष गोवारिकर और आमिर खान की ‘लगान’ प्रदर्शित हुई। विगत कुछ वर्षों से किसानों के संघर्ष पर फिल्में नहीं बन रही हैं। श्याम बेनेगल की ‘अंकुर’ ‘निशांत’ और ‘शाबाश अम्बा’ भी गांव में पानी के अभाव की सफल फिल्में हैं। किसान के परिश्रम से उसकी फसल को बेचने का अधिकार उससे छीना जा रहा है। कुछ धनाढ्य लोगों को किसान की मेहनत से भरपूर लाभ मिल सके, ऐसी व्यवस्था की जा रही है। एक भय यह है कि किसानों को बीज, ट्रैक्टर व अन्य सुविधाएं देकर व्यवस्था उनकी फसल पर अधिकार जमाना चाहती है। भयावह यह भी है कि भविष्य में किसान को वेतन दिया जाएगा और वह अपनी ही संपत्ति का वेतनभोगी चौकीदार बन सकता है। सामंतवाद ऐसे भी लौट सकता है। लाल बहादुर शास्त्री ने किसान का महत्व समझा और ‘जय-जवान जय-किसान’ का नारा दिया और मनोज कुमार ने फिल्म ‘उपकार’ बनाई। पंडित नेहरू से मनमोहन सिंह तक के प्रधानमंत्रियों ने किसानों को सहायता दी है। उन पर लाठियां बरसाना कुछ समय पूर्व प्रारंभ हुआ है।
पंडित नेहरू ने अपने युग के सभी फि़ल्मकारों को प्रेरित किया। मेहबूब खान की ‘मदर इंडिया’ के पहले दृश्य में उम्रदराज नायिका एक नहर का उदघाटन करती है। उसी सीन में एक ट्रैक्टर है। किसान सहायता का मांटेज रचा गया जो नेहरू युगीन सभी क्षेत्रों में विकास का संकेत देता है। उस दौर में विकास नारा नहीं वरन् यथार्थ था। भाखड़ा नंगल, दामोदर घाटी योजना, भिलाई इस्पात और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी की स्थापना की गई। आज आईआईटी शिक्षा प्राप्त युवा देश-विदेश में नौकरी पा रहे हैं। मेहबूब खान को जैसे ही स्टूडियो में नेहरू की मृत्यु का समाचार मिला तो हृदयाघात से उनकी मृत्यु हो गई। इसे आप इत्तेफ़ाक भी मान सकते हैं। मृत्यु पूर्व वे कश्मीर की जांबाज कवयित्री हब्बा खातून की पटकथा लिख रहे थे। आज कश्मीर की सिगड़ी बुझी हुई सी प्रतीत हो रही है परंतु भीतर ही भीतर कोयले दहक रहे हैं। महामारी के दौर में हुक्मरान हैदराबाद निगम चुनाव प्रचार कर रहा है। बहाना अतिवृष्टि से हुए नुकसान का है।
जयप्रकाश चौकसे
(लेखक फिल्म समीक्षक हैं ये उनके निजी विचार हैं)




















