धरती बचाने की चिंता बस कागजों पर

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ऊर्जा के सीमित उपयोग के लिए आयोजित अंतरराष्ट्रीय गोष्ठियां आमतौर पर औपचारिकताओं में ही निपटा ली जाती हैं। दुनिया में कोई भी ऐसा देश नहीं है जो अपने हिस्से के विकास को रोकना चाहता हो। कोई भी कार्बन उत्सर्जन पर अंकुश नहीं लगाना चाहता क्योंकि दुनिया में आज भी कोयला ही उर्जा का सबसे बड़ा स्रोत है। कम से कम आने वाले दो-तीन दशकों में हम कोयला का विकल्प तैयार नहीं कर पाएंगे। यही वजह है कि वह चाहे पैरिस का समझौता हो या फिर क्योटो में लिए गए निर्णय, हम उन पर आज तक अमल नहीं कर पाए हैं। वैसे दुनिया में कोयले की खपत में कुछ हद तक कमी आई है। आज पूरी उर्जा का 42 प्रतिशत कोयले से आता है। अगर दुनिया के आंकड़ों को देखें तो वर्ष 2010 में कोयले पर आया खर्च 134 अरब डॉलर था, जबकि वर्ष 2018 में इस पर 80 अरब डॉलर का खर्च हुआ। पर भारत में तस्वीर नहीं बदली। यहां वर्ष 2010 में कुल खर्च करीब 6 अरब डॉलर था, जो 2018 में 8 अरब डॉलर हो गया। चीन ने जरूर इस मामले में तत्परता दिखाई। वह कोयले की खपत के मामले में काफी आगे था, लेकिन अब उसने इसे नियंत्रित किया है।

वहां वर्ष 2010 में कोयले पर 50 अरब डॉलर खर्च हुए लेकिन 2018 तक उसने यह खर्च 30 अरब डॉलर पर ला दिया। जाहिर है चीन ने वैश्विक समझौतों का थोड़ा-बहुत समान किया है, लेकिन अभी बहुत कुछ और करना बाकी है। वहां 2019 में कार्बन उत्सर्जन को कम करने की जो भी तैयारी हुई वह संतोषजनक नहीं है। भारत में गत वर्ष 1.8 प्रतिशत कार्बन उत्सर्जन बढ़ा है, जो वर्ष 2018 की तुलना में कम है। दुनिया के बड़े देशों की ऊर्जा आवश्यकताएं लगातार बढ़ रही हैं। लेकिन उन्हें इसकी भरपाई के रूप में कुछ न कुछ योगदान करना चाहिए ताकि इससे एकत्रित फंड से संयुक्त राष्ट्र विकासशील देशों को राहत दे सके। दुर्भाग्य यह है कि बड़े देश इस तरह के योगदान से सीधे कतरा जाते हैं। अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील, सऊदी अरब जैसे मुल्क किसी भी तरह की भागीदारी से अब पीछे हट रहे है। अमेरिका और ब्राजील के राष्ट्रपतियों ने तो साफ कह दिया है कि जलवायु परिवर्तन जैसा कोई मुद्दा है ही नहीं। उसका एक कारण यह भी हो सकता है कि उन राष्ट्रों का नेतृत्व वर्ग किसी न किसी उद्योग का हिस्सा होता है या उससे लाभान्वित होता है।

इसलिए वह ऐसे निर्णय के साथ नहीं होता जिससे उसके व्यक्तिगत हित पर चोट पहुंचे। शहरीकरण और औद्योगीकरण के कारण भारत में ऊर्जा की मांग में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है, जिसे पूरा करने का सबसे अधिक दबाव कोयला चलित ताप विद्युत संयंत्रों पर है। यही वजह है कि ये ताप विद्युत संयंत्र देश में सबसे बड़े कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जक बन गए हैं। भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जक है। भारत कार्बन उत्सर्जन से होने वाले सामाजिक-आर्थिक नुकसान के मामले में विश्व में पहले स्थान पर है। एक टन कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन पर भारत को 86 डॉलर का नुकसान वहन करना पड़ता है। वहीं, 48 डॉलर प्रति टन के नुकसान के साथ अमेरिका दूसरे स्थान पर है। भारत में विद्युत उत्पादन की मांग पर नजर डालने पर मालूम होता है कि यह प्रतिवर्ष 6.67 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है, जबकि उत्पादन में वृद्धि 5.78 प्रतिशत की दर से हो रही है। हमारे देश में उत्पादन के 30 प्रतिशत से ज्यादा हिस्से की बर्बादी बिजली को गंतव्य तक पहुंचाने में ही हो जाती है।

यही वजह है कि मांग और उत्पादन में इतने कम फर्क के बावजूद पर्याप्त बिजली की सप्लाई नहीं हो पाती है। भारत विद्युत ऊर्जा के उत्पादन में विश्व में तीसरे स्थान पर है जबकि चीन और अमेरिका क्रमश: पहले और दूसरे स्थान पर आते हैं। भारत सरकार ने देश में कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन के बढ़ते स्तर और पैरिस समझौता द्वारा तय किए गए मानकों को गंभीरता से लेते हुए वर्ष 2030 तक इसमें 33 से 35 प्रतिशत तक कमी लाने का लक्ष्य रखा है। इसकी पूर्ति के लिए स्वच्छ ऊर्जा के उत्पादन को बढ़ावा देने के साथ ही कोयला आधारित विद्युत संयंत्रों पर निर्भरता को क्रमिक रूप से कम करने का फैसला किया है। सरकार ने मार्च 2022 तक स्वच्छ ऊर्जा में 175 गीगावाट तक की वृद्धि का लक्ष्य निर्धारित किया है जिसमें 100 गीगावाट सौर, 60 गीगावाट पवन और 15 गीगावाट अन्य स्रोतों से पूरा करने का लक्ष्य है।आज खाद्य सुरक्षा सबसे बड़ा मुद्दा है। एक अध्ययन के अनुसार यह पाया गया है कि अगर ऊर्जा की खपत इसी तरह बढ़ती चली गई तो बढ़ते कार्बन डाई ऑक्साइड के कारण दुनिया में 17 करोड़ लोग सीधे खाद्य असुरक्षा के शिकार हो जाएंगे।

इनमें भारत के भी लोग होंगे। जलवायु परिवर्तन का भारत पर भी प्रतिकूल प्रभाव पडऩे वाला है। यहां लगभग 65 प्रतिशत कृषि वर्षा पर ही निर्भर है और अगर वातावरण में इस तरह के बदलाव आए तो खेती बुरी तरह प्रभावित होगी। कार्बन डाई ऑक्साइड के बढ़ते स्तर के कारण वातावरण में तापक्रम बढ़ेगा और इसका सीधा असर ग्लेशियरों पर भी पड़ेगा। एक अनुमान है कि वर्ष 2021 तक अगर हालात यही रहे तो दुनिया में ग्लेशियर तीव्रगति से पिघलेंगे और समुद्र तल में तेजी से वृद्धि होगी। अंतरराष्ट्रीय चर्चाओं से बहुत कुछ हासिल नहीं होता। सच तो यह है कि अब हमें अपने ही स्तर पर समस्या को समझकर अपने को बढ़ते प्रदूषण से और बिगड़ती परिस्थितियों से बचाना होगा। यह तभी संभव है जब हम अपनी आदतें बदलें और नई जीवन पद्धति को अपनाने के लिए तैयार रहें। हमें वर्तमान की कई सुख-सुविधाएं छोडऩे के लिए भी तैयार रहना होगा।

अनिल पी जोशी
(लेखक पर्यावरणविद हैं, ये उनके निजी विचार हैं)

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