भगवान श्रीनृसिंह का प्राकट्य महोत्सव
श्री नृसिंह भगवान की पूजा-अर्चना से मिलती है शत्रुओं पर विजय
होता है समस्त बाधाओं का शमन
भारतीय संस्कृति के हिन्दू सनातन धर्म में देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना करके व्रत-उपवास रखने की धार्मिक व पौराणकि मान्यता है। ज्योतिषविद् श्री विमल जैन जी ने बताया कि वैशाख शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि के दिन भगवान नृसिंह का प्राकट्य महोत्सव मनाने की धार्मिक व पौराणिक मान्यता है। इस बार भगवान श्री नृसिंह जयन्ती का पर्व 17 मई शुक्रवार को मनाया जाएगा। चतुदर्शी तिथि 17 मई, शुक्रवार को प्रातः 06 बजकर 05 मिनट पर लगेगी, जो कि उसी दिन 17 मई, शुक्रवार की अर्द्धरात्रि के पश्चात् 04 बजकर 11 मिनट तक रहेगी। 17 मई, शुक्रवार को सम्पर्ण दिन चतुदर्शी तिथि का मान होने से व्रत-उपवास इसी दिन रखा जाएगा।
पौराणिक मान्यता के अनुसार वैशाख शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि के दिन श्री नृसिंह भगवान ने खम्बे (स्तम्भ) को फाड़कर भक्त प्रहलाद की रक्षा के लिए अवतार लिया था। इसीलिए श्री नृसिंह जयन्ती का उत्सव बड़े धूमधाम के साथ मनाया जाता है।
कैसे करें पूजा – प्रख्यात ज्योतिर्विद श्री विमल जैन जी ने बताया कि प्रातःकाल ब्रह्म मूहूर्त में अपने समस्त दैनिक कृत्यों से निवृत्ति होना चाहिए। तत्पश्चात अपने आराध्य देवी-देवता की पूजा-अर्चना करने के बाद श्री नृसिंह भगवान के व्रत का संकल्प लेना चाहिए। श्री नृसिंह भगवान की मूर्ति स्थापित कर उनका श्रृंगार करके मध्याह्र काल में पूजा-अर्चना करके का विधान है। व्रतकर्ता को चाहिए कि अपनी दिनचर्या नियमित संयमित रखते हुए भगवान श्री नृसिंह भगवान जी को ऋतुफल, नवैद्य, विभिन्न प्रकार के मिष्ठान्न आदि अर्पित करके धूप-दीप के साथ पूजा-अर्चना करनी चाहिए। श्री नृसिंह भगवान के प्रतिष्ठित मन्दिर में पूजा-अर्चना करके दान -पुण्य करना अत्यन्त फलकारी है। नृसिंहपुराण में वर्णित व्रत-कथा सुनननी चाहिए तथा ब्राह्मण को यथाशक्ति नववस्त्र, स्वर्ण, रतज, गौ एवं तिल तथा अन्य उपयोगी वस्तुओं का दान करना चाहिए। रात्रि में जागरण करके कीर्तन के साथ पूजा-अर्चना करने की कविशेष महिमा है। पौराणिक मान्यता है कि श्री नृसिंह भगवान का नियमित रूप से व्रत रखने पर शत्रुओं पर विजय के साथ ही सुख-समृद्धि की भी प्राप्ति होती है।



















