देश के छह राज्यों में ग्रामीण इलाकों में रहने वाली गर्भवती और प्रसूताओं के बीच हुए सर्वे से मिले नतीजे काफी चिंताजनक हैं। ये सर्वे मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, झारखंड, ओडिसा और हिमाचल में किये गये हैं। स्थिति कितनी दयनीय है, इसके लिए समझना काफी है कि 30 फीसद परिवारों को प्रसव का खर्चा पूरा करने के लिए अपनी संपत्ति तक बेचनी पड़ गई। कुपोषण का परिणाम है कि प्रसव से पहले तक महिलाओं का वजन 40 किलो से भी कम पाया गया। जबकि आमतौर पर प्रसव के समय और बाद में महिलाओं का वजन स्वाभाविक रूप से बढ़ जाता है। सामान्य दिनों की अपेक्षा इन विशेष दिनों में परिवार वाले महिलाओं के खान-पान पर विशेष ध्यान देते हैं। पर ग्रामीण इलाकों में महिलाओं की सेहत शहरी क्षेत्र की तुलना में चिंताजनक है, यह गंभीर स्थिति है। महिलाओं की सेहत और उससे जुड़े तमाम मामलों में केन्द्रीय महिला बाल विकास मंत्रालय हो या फिर राज्यों के चिकित्सकीय सुविधाओं से लेकर आर्थिक मदद तक की व्यवस्था की जाती है।
माना कि जनसंख्या के आकार के हिसाब से बजट आवंटित नहीं होता, फिर भी महिलाओं और बच्चों के लिए विशेष केन्द्रों की मौजूदग के बावजूद परिदृश्य उत्साहवर्धक नहीं है तो उन वजहों को तलाशने की जरूरत है। जिसके चलते जमीनी स्तर पर अपेक्षानुसार बदलाव होता नहीं दिख पा रहा है। सर्वे में यूपी को लेकर जो निष्कर्ष सामने आये हैं वे चिंता के साथ सवाल भी खड़ा करते हैं। गांवों में आर्थिक सेहत पहले से इतनी डांवाडोल है कि गर्भवती महिलाओं के खानपान और उनकी दवाइयों पर परिवार वाले चाहकर भी ध्यान नहीं दे पाते। इस बारे में यथास्थिति का आलम यह है कि 48 फीसदी महिलाओं का यह भी पता नहीं कि गर्भधारण करने के बाद उनका वजन बढ़ा भी या नहीं। स्थिति यह है कि सर्वे में सिर्फ 12 फीसदी महिलाओं ने यह माना कि वे पौष्टिक खाना लेती हैं। वैसे प्रधानमंत्री ने 2016, 31 दिसम्बर को घोषणा की थी कि देशभर में गर्भवती महिलाओं को 6 हजार रुपये का मातृत्व लाभ मिलेगा।
इसके लिए 2017-18 में 27,000 करोड़ रुपये का प्रावधान भी था। हालांकि जरूरत के हिसाब से यह आवंटित राशि कम है, फिर भी इसका भी लाभ सिर्फ आधी महिलाओं को मिल सका वो भी थोड़ा-थोड़ा। हां इस सबके बीच अच्छी बात यह है कि महिलाएं प्रसव के लिए सरकारी या निजी अस्पतालों की तरफ रुख कर रही हैं। सिर्फ 12 फीसदी महिलाएं ऐसी मिलीं जिनका प्रसव घर पर हुआ। तो गर्भवती महिलाओं को लेकर सबसे बड़ी चुनौती यूपी में है, जहां तय सुविधाओं को भी ठीक ढंग से लागू होने में दुश्वारियां हैं। जरूरत इन दुश्वारियों को पहचानने और उसे दूर करने की है ताकि गर्भवती महिलाओं, प्रसूताओं के साथ ही नवजात बच्चों की भी सुरक्षित देखभाल हो सके । स्वस्थ महिलाएं ही स्वस्थ शिशु का आधार बनती हैं। यदि इस पक्ष पर बजट के साथ ही उसके ईमानदार क्रियान्वयन पर ध्यान नहीं दिया गया तो देश के भविष्य का अंदाजा लगाया जा सकता है। इसमें सरकारी एजेंसियों की बड़ी भूमिका है।



















