जम्मू कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने कई बड़े दावे किए हैं। उन्होंने कहा हैं कि राज्य में हालात सुधर गए हैं। वे पिछले साल अगस्त में राज्य के राज्यपाल बने थे। यानी अभी उनका एक साल पूरा नहीं हुआ है। नौ महीने के कार्यकाल के लिहाज से उनके दावे जरा बड़े हैं और उन पर भरोसा करने से पहले कुछ जमीनी हालात की पड़ताल जरूरी है। उन्होंने जिस दिन कहा कि हालात सुधरे हैं, आतंक वादी घटनाएं कम हुई हैं और अलगाववादी संगठन बातचीत के लिए तैयार हैं उस से दो-चार दिन पहले ही आतंक वादियों से लड़ते हुए सेना के मेजर केतन शर्मा शहीद हुए थे। वैसे भी गृहमंत्री अमित शाह ने साफ कर दिया है कि अलगाववादियों से कोई समझौता नहीं होगा। बुधवार को वो जम्मू-कश्मीर के दौरे पर ही रहे। उसी हफ्ते में अलग-अलग घटनाओं में सुरक्षा बलों के चार जवान शहीद हुए थे और राज्य पुलिस के एक एसएचओ भी आतंक वादियों से लड़ते हुए शहीद हुए थे।
जिस दिन उन्होंने हालात सुधरने का दावा किया उस दिन भी सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में चार आतंकवाद मारे गए। ये चारों आतंकवादी स्थानीय थे औ अल कायदा की भारतीय शाखा से जुड़े थे। यह सही है कि जम्मू कश्मीर में पहले के मुकाबले हालात बदले हैं। सुरक्षा बलों ने ज्यादा आक्रामक रवैया अपनाया है तो राष्ट्रीय जांच एजेंसी लगातार आतंक वादियों को मिलने वाली मदद का स्रोत बंद करने में लगी है। सीमा पार भी दो बार कार्रवाई हुई है, जिससे आतंक वादियों को तैयार करने वाले शिविरों में हलचल कम हुई होगी। पर इसका यह मतलब नहीं है कि जम्मू कश्मीर के हालात पूरी तरह से ठीक हो गए हैं। पूरी तरह से हालात ठीक करने के लिए जरूरी है कि सुरक्षा बलों की कार्रवाइयों के साथ साथ वार्ता भी चले। राज्य के सभी संबंधित पक्षों से बातचीत हो और पाकिस्तान के साथ भी कूटनीतिक वार्ता हो। तभी यह समस्या हल होगी। सिर्फ सुरक्षा बलों और एनआईए की कार्रवाई के दम पर कश्मीर समस्या को सुलझा लेने का दावा सही नहीं है। अगर सिर्फ इस साल की बात करें तो सबसे बड़ी घटना पुलवामा में हुई। फरवरी में आतंक वादियों ने केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल, सीआरपीएफ के काफिले पर हमला किया, जिसमें 40 जवान शहीद हुए।
उनके बाद भी इस महीने 12 जून को दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग में आतंक वादियों के हमले में सीआरपीएफ के पांच जवान मारे गए। छिटपुट होने वाली मुठभेड़ों और उनके शहीद होने वाले अधिकारियों और जवानों को छोड़ दें तो ये दो बडी घटनाएं इस साल में हुई हैं। हाल ही में आतंक वादियों ने भाजपा के एक नेता की हत्या कर दी। स्थानीय आतंक वादियों के मारे जाने पर उनके जनाजे में जुटने वाली भीड़ पहले की तरह जुटती है। स्थानीय लोग ऐसी मुठभेड़ों का विरोध भी करते हैं और सुरक्षा बलों के खिलाफ प्रदर्शन भी होते हैं। इन्हें काबू में रखने के लिए इंटरनेट और मोबाइल सेवा पहले की ही तरह बंद रखनी होती है। हाल में लोक सभा के चुनाव हुए हैं, जिसमें घाटी के अंदर ज्यादातर जगहों पर मतदान प्रतिशत दहाई में नहीं पहुंच सका। ऊपर से अनुच्छेद 35ए और अनुच्छेद 370 को हटाने की अटकलों की वजह से घाटी में अंदर अंदर लोगों में बड़ा उबाल है, जिसे काबू करने का कोई ठोस प्रयास अभी नहीं दिख रहा है। इसलिए सिर्फ इस आधार पर ही अलगावादी खास कर हुर्रियत के लोग बातचीत के लिए तैयार हो गए हैं, यह कहना जल्दबाजी है कि हालात सुधर गए हैं। हुर्रियत कांफ्रेंस के लोग सरकार से बातचीत के लिए तैयार हैं। पर उसका कारण दूसरा है।
इसका एक मात्र कारण यह है कि पहली बार हुर्रियत के नेताओं को केंद्रीय एजेंसियों की मार झेलनी पड़ रही है। कई अलगाववादी नेता गिरफ्तार हैं या नजरबंद हैं। उनको सबसे ज्यादा मार उनके आर्थिक स्रोत पर पड़ी है। एनआईए ने उनको मिलने वाली फंडिंग की जांच की है और उसे बंद करने रास्ते निकाले हैं। पुरानी फंडिंग के मामले में कइयों के खिलाफ धनशोधन का मामला दर्ज हुआ है। तभी हुर्रियत के नेता अपने लिए राहत चाहते होंगे और संभवत: इसलिए बातचीत को तैयार हुए हैं। एक दूसरा बदलाव यह दिख रहा है कि अब स्थानीय लोग लगातार होने वाली हिंसा से ऊबे हुए हैं और थक गए हैं। हो सकता है कि हुर्रियत के नेताओं ने इसे भी महसूस किया हो। इसलिए भी वे बातचीत के लिए तैयार हो रहे हों। पर बातचीत से पहले जमीनी हालात को और ठीक करना होगा। चुनाव कराने होंगे और सीमा पार से होने वाली गतिविधियों को रोकने के लिए ठोस प्रयास करने होंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बार बार अटल बिहारी वाजपेयी की यह बात दोहराई है कि कश्मीर समस्या कश्मीरियत, इंसानियत और जम्हूरियत के तीन मंत्रों के आधार पर सुलझाई जाएगी। सो, सबसे पहले तो जम्हूरियत को स्थापित करना होगा। राज्य में चुनाव करा कर सरकार बनवानी होगी। चुनी हुई सरकार इंसानियत और कश्मीरियत के दो मंत्रों को ज्यादा बेहतर ढंग से अमल में ला सकती है।
तन्मय कुमार
(लेखक पत्रकार हैं, ये उनके निजी विचार हैं)




















