रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने कहा है कि भारत के लिए यह वाजिब है कि लॉकडाउन के तीसरे.चौथे चरण की स्थिति ना आने दी जाये। धीरे-धीरे देश के भीतर सोशल डिस्टेंसिंग तथा टेस्टिंग के साथ आर्थिक गतिविधियों की शुरुआत करनी होगी, इससे अर्थव्यवस्था की सेहत वसूली के साथ घर बैठ चुके कार्मिकों को दोबारा काम में लगाया जा सकेगा। भारतीय परिप्रेक्ष्य में लबी अवधि का लॉकडाउन तबाही का सबब बनेगा। रिजर्व में इतना पैसा नहीं है कि लबे समय तक घर पर बिठाकर पगार दी जा सके। पश्चिमी देशों की बात और है, वे इस तरह की स्थिति को संभाल सकते हैं। अर्थव्यवस्था का लॉकडाउन धीरे-धीरे खोलने के बीच फौरी तौर पर 65 हजार करोड़ रुपये की मदद की जा सकती है। भारतीय राजकोष सक्षम है, यह बात उन्होंने कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी के एक सवाल के जवाब में साझा की। हालांकि खुद केन्द्र सरकार भी यह समझ रही है कि यथास्थिति से अर्थव्यवस्था कोमा में भी जा सकती है। पिछले दिनों मुयमंत्रियों के साथ वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये इसको लेकर गहन चर्चा हुई थी। उमीद ही बहुत शीघ्र ही देश के सामने कोई रोडमैप जरूर आएगा, जिसके आधार पर औद्योगिक जगत भी राहत की सांस ले सके।
इन दिनों लॉकडाउन के चलते प्रवासी मजदूरों की घर वापसी की जरूरत महसूस करते हुए राज्य सरकारें कई कदम उठा रही हैं। खास तौर पर यूपी की बात करें तो योगी सरकार मजदूरों को लेकर प्रतियोगी छात्र-छात्राओं तक के लिए रोडवेज बसों के जरिये वापस लाने का इंतजाम कर रही है। दिल्ली-यूपी बॉर्डर पर हजारों की तादाद में उमड़े प्रवासी मजदूरों, उनके परिजनों के लिए एक हजार बसों की तत्काल व्यवस्था का मामला रहा हो, चाहे कोटा या फिर राज्य में ही प्रयागराज से प्रतियोगी विद्यार्थियों को लाने का सवाल हो, बड़ी संजीदगी से कदम उठाया जा रहा है। इन तबकों ने इसके लिए मोदी सरकार की सदाशयता को सराहा भी है। कुछ राज्यों से तो प्रवासी मजदूरों के लिए विशेष ट्रेनें भी चलाने की मांग उठी है ताकि घर वापसी को रफ्तार मिल सके। स्वाभाविक है, कोई भी राज्य आखिर कब तक तीनों वक्त के खाने का इंतजाम करता रहेगा?
रैनबसेरों में भी आखिर कितने प्रवासी परिवारों का समायोजन हो सकता है। नये रैनबसेरों की भी तो एक सीमा है। योगी सरकार ने स्थिति की गंभीरता को देखते हुए विशेष परिवहन सेवाओं को विस्तार दिया है तथा यह आग्रह भी किया है कि कोई श्रमिक पैदल आने का जोखिम न उठाये, सबकी व्यवस्था हो रही है। दरअसल पिछले दिनों यह खबर आयी थी कि एक मजदूर मुंबई से पैदल चलकर श्रावस्ती अपने घर तो पहुंचा लेकिन भूख और कमजोरी व थकान के चलते दम तोड़ गया। जल्दी के चक्कर ऐसा जोखिम उठाने में जान भी जा सकती है। यही नहीं, योगी सरकार ऐसे श्रमिकों के लिए राज्य के भीतर ही रोजगार देने की दिशा में कार्ययोजना बना रही है। समझा जाता है कि इस दिशा में फिलहाल कुछ लाख मजदूरों को काम पर लगाया जा सकता है। आसन्न संकट की घड़ी में प्रवासी मजदूरों की जो सूरत उभरकर सामने आयी, उस पर गंभीर मंथन की जरूरत है।




















